dhoop ki wapsi

dhoop ki wapsi
जैसे शीशे का परिवेश बरामदे की धूप की अगली कड़ी है, ठीक वैसे धूप की वापसी की उत्पत्ति भी बरामदे की धूप से ही हुई है। बरामदे की धूप मेरी रचना यात्रा ही नहीं मेरी जीवन यात्रा के लिये भी बरदान अथवा अभिशाप दोनों ही हैं यह सच है कि मैं बरामदे कि धूप से कभी मुक्ति नहीं पा सका यह मेरे अचेतन अर्द्धचेतन और चेतन में कुंडली मार कर बैठी है इससे मुक्ति  शायद मेरे लिए संभव नहीं धूप की वापसी में...More

You may also like...

sapne me aana maa

Family Social Stories Hindi

Kundakali

Poetry Marathi

Gaav ani barech kahi

Poetry Marathi

udaas nahi hua tha ghar

Family Poetry Hindi